राजस्थान दिवस (29 मार्च)—प्रवासी नज़र से

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रतनलाल अग्रवाल, कोलकाता-निवासी

29 मार्च को जब राजस्थान अपना स्थापना-दिवस मनाता है—धोला-मारू की धरती, की ताक़त, रंग-बिरंगी माड़-पगड़ियों की याद—मैं कोलकाता की एक पुरानी गली से वो सब महसूस करता हूँ, जो बचपन में दादा-जी की जुबानी सुनी थी।

मैं मूलतः राजस्थान की राजधानी जयपुर का रहने वाला था; लगभग 48 साल पहले व्यापार के सिलसिले में पश्चिम बंगाल आया, फिर यहीं का हो गया। बंगाल ने स्नेह दिया, पर राजस्थान की मिट्टी की खुशबू कभी नहीं छूटी। मन में अक्सर मारवाड़ की रेत-बयार चल उठती है—क्योंकि प्रवासी तो शरीर से जाता है, यादें साथ रह जाती हैं

राजस्थान दिवस पर मैं क्या याद करता हूँ?

वो “काँकड़-पानी” की सीख: कमी में जीना, फिर भी अतिथि को राजभोग देना। कोलकाता में मेरा आर आर अग्रवाल ज्वेलरस के नाम से ज्वेलरी का कारोबार हैप्रवासी के तौर पर मेरा छोटा योगदान हर साल 29 मार्च को हम स्थानीय राजस्थानी सभा के साथ “केसरिया शाम” रखते हैं—गलियों में गेहूँ-की-रोटी, गुड़-घी, केर-सांगरी बाँटी जाती है। बंगाली पड़ोसी भी आते हैं; उन्हें मैं बताता हूँ कि मारवाड़ की मरुभूमि सिर्फ रेत नहीं, संयम और शौर्य की पाठशाला है। बंगाल की रस-चेतना और राजस्थान की ठहराव-संस्कृति का यह मिलन मेरे लिए असली मिलाप है।

संदेश
राजस्थान दिवस हमें याद दिलाता है कि सीमाएँ कागज़ पर हैं, मन की जड़ें कहीं गहरी होती हैं। पश्चिम बंगाल ने मुझे घर दिया, राजस्थान ने पहचान। प्रवासी होना दोहरी ज़िम्मेदारी है—जहाँ रहो, उसकी सेवा करो; जहाँ से आओ, उसकी स्मृति सुरक्षित रखो।

इस 29 मार्च, कोलकाता की एक मेज पर दीप जलाते हुए मैं वही प्रार्थना करता हूँ जो दादा-जी करते थे: “थार की माटी महकती रहे, बंगाल की नदियाँ बहती रहें—और हम, दरम्यान के पुल, दोनों को जोड़ते रहें।”

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