यादों के सहारे जीता Bijoy Kumar Mazumdar
-सप्तर्षि विश्वास
विजय कुमार मजूमदार ने रिटायरमेंट के बाद एक शांत ज़िंदगी की कल्पना की थी—सुबह की चाय, अख़बार की बातें, और पत्नी के साथ बीते हुए लम्हों को फिर से जीना। लेकिन ज़िंदगी ने उसके लिए कुछ और ही तय कर रखा था।
एक हादसे ने उसकी दुनिया छीन ली। उसकी धर्मपत्नी आधे रास्ते में ही उसका साथ छोड़ गई। घर वही था, दीवारें वही थीं, लेकिन अब हर कोना खाली लगता था। दस कदम साथ चलने के बाद अकेले घर लौटना उसे हर दिन तोड़ देता।
कहते हैं, अपनों को खोने का दर्द वही समझ सकता है जिसने सच में किसी को खोया हो। मजूमदार अब यही दर्द जी रहा था। यादें उसका पीछा नहीं छोड़ती थीं—कभी रसोई की खुशबू में, कभी शाम की खामोशी में।
अकेलेपन ने उसे भीतर से हरा दिया था, लेकिन उसने हार मानना नहीं सीखा। उसने अपने दर्द को दूसरों की ताकत बना लिया। अब वह हर उस इंसान की तलाश में रहता, जो बीमार हो, असहाय हो या टूट चुका हो। किसी के सिर पर हाथ रखकर, किसी की मदद करके, वह अपने खालीपन को भरने की कोशिश करता।
लोग कहते—“हारे हुए इंसान की कीमत चवन्नी जैसी होती है।” लेकिन मजूमदार ने साबित किया कि वही इंसान, अगर चाहे, तो किसी और की दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।
रात को जब वह आँखें बंद करता, तो कभी-कभी उसे अपनी पत्नी दिख जाती—मुस्कुराती हुई। शायद यही उसके जीने की वजह थी… यादों के सहारे, लेकिन किसी और के लिए रोशनी बनकर।
