पुराने सदाबहार गीतों को सुनते-सुनते करते हैं मुश्किल से मुश्किल डेंटल इंप्लांट सर्जरी
कोलकाता। अगर आपके दांत गिर गए हैं या किसी वजह से दांतों को खोना पड़ा है, तो डेंटल इंप्लांट आपके लिए एक विकल्प हो सकता है। जबड़े की हड्डी में टाइटेनियम इंप्लांट लगाकर उसके ऊपर कृत्रिम दांत लगाए जाते हैं, जिसे आमतौर पर डेंटल इंप्लांट ट्रीटमेंट कहा जाता है।
लेकिन जबड़े की हड्डी में स्क्रू लगाने की बात सुनते ही कई लोगों के मन में डर पैदा हो जाता है। ऐसे में आगरा के इंप्लांटोलॉजिस्ट डॉ. अजय विक्रम सिंह का काम और उनका सर्जरी करने का अंदाज खासा दिलचस्प है।

बताया जाता है कि वे कठिन डेंटल इंप्लांट प्रक्रियाओं के दौरान पुराने सदाबहार गीत सुनते हुए बेहद सहज तरीके से सर्जरी करते हैं। मरीजों के लिए यह अनुभव कई बार उनके मन में बैठे डर को कम करने वाला भी साबित होता है।
डॉ. अजय विक्रम सिंह पिछले 22 वर्षों से अधिक समय से इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इंप्लांटोलॉजी में इस्तेमाल होने वाली विभिन्न तकनीकों और उपचार पद्धतियों के साथ उनका लंबा क्लिनिकल अनुभव रहा है। उनके पास देश के अलग-अलग हिस्सों से मरीज जटिल मामलों में उपचार के लिए पहुंचते हैं।
डॉ. अजय विक्रम सिंह ने ‘Clinical Implantology’ नामक पुस्तक भी लिखी है, जिसका उपयोग दंत चिकित्सा के क्षेत्र में संदर्भ सामग्री के रूप में किए जाने का दावा किया जाता है।

दांतों का सही आकार और फिट तैयार करना इंप्लांट ट्रीटमेंट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसी क्रम में डॉ. अजय विक्रम सिंह ने इंप्रेशन से जुड़ी एक तकनीक विकसित करने पर भी काम किया है। उनका उद्देश्य मरीज के प्राकृतिक दांतों के आकार, बनावट और जरूरत के अनुरूप कृत्रिम दांत तैयार करना है, ताकि वे अधिक प्राकृतिक दिखाई दें और मरीज के लिए आरामदायक हों।
उनके अनुसार, इंप्लांट ट्रीटमेंट के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि मरीज अपने मामले के अनुसार सही और अनुभवी डॉक्टर का चयन करे, भले ही डॉक्टर किसी बड़े महानगर के बजाय छोटे शहर में ही क्यों न प्रैक्टिस करते हों।
डॉ. अजय विक्रम सिंह के पास भारत के विभिन्न हिस्सों के अलावा विदेशों से भी मरीज उपचार के लिए पहुंचते हैं। हालांकि, प्रत्येक मरीज के लिए इंप्लांट की जरूरत, प्रक्रिया और परिणाम अलग-अलग हो सकते हैं और इसका निर्णय चिकित्सकीय जांच के बाद ही किया जाता है।
कहते हैं, डॉक्टर को भगवान का स्वरूप माना जाता है। लेकिन किसी डॉक्टर की विशेषज्ञता के पीछे वर्षों की पढ़ाई, प्रशिक्षण, अभ्यास और अनुभव छिपा होता है। ऐसे में जब कोई डॉक्टर अपने काम को पूरी सहजता और समर्पण के साथ करता है, तो मरीज के लिए वह अनुभव निश्चित रूप से खास बन जाता है।
